न चट्टान-न पानी, टनल में दलदल ने रोका रास्ता:ड्रम काटकर बोट बनाई, 90 मीटर अंदर पहुंचे, कमर तक धंसे रेस्क्यू करने वाले
मैं टनल में रेस्क्यू के लिए घुसा, तो दलदल में धंसने लगा। जितना हिलता, उतना ही धंसता गया। फिर समझ आया कि यहां जमीन ही निगल रही है। मैं कमर तक धंसा था। निकलने ...

मैं टनल में रेस्क्यू के लिए घुसा, तो दलदल में धंसने लगा। जितना हिलता, उतना ही धंसता गया। फिर समझ आया कि यहां जमीन ही निगल रही है। मैं कमर तक धंसा था। निकलने में करीब 1 घंटे लग गए। रसुवा की इस टनल में जो देखा, ऐसा अनुभव पहले कभी नहीं हुआ।’

ये बता रहे माउंटेन गाइड विक्रम कर्के रसुवा की टनल में चल रहे रेस्क्यू ऑपरेशन का हिस्सा हैं। वे चिलिमे, त्रिशूली-1 और त्रिशूली-3 A टनल के रेस्क्यू में शामिल हैं, जहां 100 से ज्यादा लोग फंसे हुए हैं। इन्हें निकालने के लिए नेपाल और भारतीय सेना समेत कई देशों की रेस्क्यू टीमें जुटी हैं। टनल के अंदर का हाल बताते हुए विक्रम कहते हैं, ‘मशीनों के बिना यहां फंसे लोगों तक पहुंचना मुश्किल है। विक्रम ने हमें रेस्क्यू की पूरी कहानी बताई…
सबसे पहले चिलिमे टनल…
ड्रम काटकर बोट बनाई, टनल में 90 मीटर अंदर पहुंचे
विक्रम कर्के नेपाल माउंटेनियरिंग एसोसिएशन के माउंटेन रेस्क्यू कोऑर्डिनेटर हैं। वे दो बार एवरेस्ट जा चुके हैं। विक्रम बताते हैं, ‘26 अगस्त की सुबह करीब 10 बजे एक पुलिस अधिकारी का फोन आया। पता चला कि रसुवा में बड़ी तबाही हो गई है। खबर सुनते ही मैंने सात साथियों को इकट्ठा किया। मौसम खराब था इसलिए हम एक दिन काठमांडू में ही फंसे रहे। दूसरे दिन मोटरसाइकिल से रसुवा पहुंचे।‘

विक्रम के मुताबिक, पहले त्रिशुली-1 हाइड्रोपावर इलाके में रेस्क्यू करना था। सेना ने कहा कि अभी नीचे जाना सेफ नहीं, इसलिए लौटना पड़ा। वे बताते हैं,
‘पहले जो टीमें अंदर गई थीं, वे करीब 90 से 100 मीटर तक जाकर लौट रही थीं। वहां रेक्स्यू के वक्त मौजूद गृह मंत्री सुदन गुरंग ने सुझाव दिया कि ड्रम काटकर बोट की तरह इस्तेमाल करनी चाहिए। पहले सुनने में अजीब लगा, लेकिन रेस्क्यू में जब सामान्य तरीके फेल हो जाएं, तो असामान्य तरीके ही काम आते हैं।’

’हमने ड्रम काटकर प्लाईवुड लगाया। फ्लोट करने वाला सामान लगाया। फिर उस पर लेटकर आगे बढ़े। ऐसे करीब 90-95 मीटर तक पहुंचे, लेकिन आगे रास्ता बंद था। उसके दूसरे तरफ 6 लोग फंसे हैं, जिन्हें निकालना है। हाथ से मिट्टी हटाकर आगे जाना संभव नहीं। हमने बताया कि अब मड पंप, वाटर पंप और खुदाई की मशीन के बिना रेस्क्यू संभव नहीं है।‘
‘हमारे पास जो मशीनें हैं, उन्हें पहुंचाने का रास्ता नहीं’
बिक्रम बताते हैं, ‘हमारे साथ भारतीय सेना के 26 लोग थे। उनके कमांडिंग ऑफिसर मेहरा साहब के पास मशीनें थी। हमारे पास क्लाइंबिंग उपकरण, रस्सियां और एंकर थे। ये सब दलदल में रेस्क्यू के लिए पर्याप्त नहीं थे। हमें एक्सकेवेटर, मड पंप और ड्रिलिंग मशीन चाहिए। एक एक्सकेवेटर करीब 3 टन का है। इसे टनल तक पहुंचाने के लिए बड़ा हेलिकॉप्टर चाहिए।‘

‘यहां मुश्किल ये आई कि लैंडिंग स्पॉट छोटा है, इसलिए बड़ा हेलिकॉप्टर नहीं उतर सकता। क्योंकि पहाड़ करीब है और रोटर के टकराने का खतरा है। हमारे पास जो मशीनें भी हैं, उन्हें भी पहुंचाने का रास्ता नहीं है।‘


